श्री वृंदावन धाम का पौराणिक इतिहास
श्री धाम वृंदावन का पौराणिक एवं आधुनिक इतिहास जैसा कि कहा जाता है कि 'वृंदावन धाम अपार' वास्तव में इस धाम का महत्व अस्तित्व एवं इतिहास अपार है जिसे जान पाना साधारण जन के लिए अत्यंत कठिन है फिर भी कुछ पुरानों , उदाहरणों एवं संत ज्ञानियों की वानियों के आधार पर इसे समझने का प्रयास अवश्य कर सकते हैं। वृंदावन का शाब्दिक अर्थ 'वृंदा का वन' है किंतु वृंदा राधा रानी के सोलह नामों में से एक नाम भी है। जिसके आधार पर इस स्थली का नाम वृंदावन पड़ा है। राधा सोडस नाम्ना च वृंदा नाम श्रुतौ श्रुतम् तस्या क्रीड़ावनम् रम्यम् तेन वृंदावनम् स्मृतम। (ब्रह्म वैवर्त पुराण) वहीं दूसरी ओर इसी पुराण के अनुसार सतयुग में श्री केदार चक्रवर्ती धार्मिक राजा की लक्ष्मी अंशिता वृंदा नाम की एक पुत्री थी जिसने महर्षि दुर्वासा से विष्णु मंत्र प्राप्त कर कृष्ण प्राप्ति हेतु घोर तप किया तब भगवान श्री हरि ने प्रसन्न होकर उसका वरन किया और अपने साथ गोलोक धाम ले गए कृष्ण अवतार में वही वृंदा राधा रानी की प्रिय सखी बनकर उत्पन्न हुई। जिन्हें आज वृंदा देवी के नाम से जाना जाता है वही वृंदा देवी भगवान प्रिया प्रीतम की अनन्य लीलाओं में मग्न होकर इस धरा पर निवास करती हैं उन्हीं की स्थली होने के कारण इस धरा को वृंदावन कहा गया है अस्ति वृंदावनम यस्यास्तेन वृन्दावनी स्मृता वृन्दा वनस्याधिदेवी,तेन वायम् प्रकीर्तिता। (ब्रह्म वैवर्त पुराण) इसे भगवान का गोलोक धाम भी कहा गया है गर्ग संहिता के अनुसार एक बार द्वापर के अंत में भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दक्षिणावर्त शक्ति श्री राधे रानी से गोलोक बिहार का आग्रह किया जिस पर श्री राधे जु ने कहा कि जहां पर वृंदावन नहीं, गोवर्धन नहीं, यमुना नहीं वहां जाकर मुझे सुख की प्राप्ति नहीं होगी। यत्र वृंदावनम् नास्ति न यत्र यमुना नदी। यत्र गोवर्द्धनो नास्ति, तत्र मे न मन: सुखम् (गर्ग संहिता) तब भगवान श्रीकृष्ण ने किशोरी जी के मन के अनुरूप इन तीनों को अवतरित किया। श्री वराह पुराण के अनुसार भगवान बाराह पृथ्वी देवी से कहते हैं कि... वृंदावनम् द्वादशमम् वृन्दया परिरक्षितम। मम् चैव प्रियम भूम: सर्व पातक नशनम्। (बाराह पुराण) ही वसुधे यह यह वृंदावन द्वादश वनों युक्त श्री वृंदा महारानी द्वारा संरक्षित है जो मुझे अत्यंत प्रिय है तथा सभी तापों का नाश करने वाला है। बात द्वादश वनों की हुई है तो यह भी जान लेना आवश्यक है कि इस स्थली पर 12 वन, 12 उपवन,12 अधिवन तथा 12 प्रतिवन निम्न पुराणों द्वारा बताए गए हैं। पद्मपुराण अनुसार बारह वन महावन, ताल वन,कुमुद वन, काम्यवन, कोकिलावन, भांडीरवन छत्रवन खदिर वन, भद्र वन ,बहुला वन, लोहवन विद्रुम वन। वाराह पुराण के अनुसार बाराह उपवन ब्रह्मवन, अप्छरा वन, बिछल वन, कदम्ब वन, स्वर्णवन, प्रेमवन, मयूर वन शेष, मानेंगित वन, नारद वन परमानंद वन एवम सुरभि वन। विष्णु पुराण के अनुसार बारह अधिवन मथुरा, राधा कुंड, नंद गांव, गढ़,ललिता गांव, वृषभानु पुर, गोकुल , गोवर्धन, जाब ,संकेत, वृंदावन और मधुबन मत्स्य पुराण के अनुसार बारह प्रतिवन रंक वन, वार्तावन, करहा वन, कामना वन,अंजन वन, कर्ण वन, कृष्ण दिपन वन, नंद प्रेक्षण वन,इंद्र वन, शिक्षा वन, तपोवन तथा वत्स वन हैं वृंदावन के प्रख्यात पंडित कवि श्री वृंदावन बिहारी मिश्र (बिंदु जी) ने अपनी पुस्तक 'वृंदावन वैभव दर्शन, में वृंदावन अधिवन के अंतर्गत नौ उपवनों को वर्णित किया है। वृंदावन के अंतर में नो उपवन भी कहलाते वन। निधिवन निकुंज वन किशोर वन गंभीर सुमन वन घोर सघन। केमार वन है अशोक वन, वनबिहार वन और अटलवन। सौभरिवन,सुनरख तक सीमित रक्षा गोचर की वृंदावन। करें भागवत शोभा वर्णन नव वृंदावन धाम की। ब्रज में बिंदु बखाने महिमा श्री वृंदावन धाम की। इस प्रकार हम पाते हैं की पौराणिक दृष्टि से वृंदावन के महत्व को जानना अत्यंत ही कठिन है, अगले अंक में हम वृंदावन के ऐतिहासिक महत्व को समझने का प्रयास करेंगे धन्यवाद सौजन्य से श्री बृजवासी पंडा सभा (तीर्थपुरोहित) श्री धाम वृंदावन