श्री राधा वल्लभ लाल
श्री राधावल्लभ लाल जी का प्राकट्य संवत 1591 विक्रमी में कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को श्री वृंदावन धाम के परिक्रमा मार्ग में स्थित मदन टेर नामक स्थान में प्रथम पाटोत्सव के रूप में हुआ आप गोस्वामी श्री हित हरिवंश जी के शिव ठाकुर हैं सहारनपुर जिला अंतर्गत चरथावल नामक ग्राम से विप्र श्री आत्मदेव के द्वारा ठाकुर की प्राप्ति हुई थी। श्री वृंदावन धाम में आकर बृजवासियों से आपको पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ तब से दैनिक पांच आरती एवं सात बार भोग की परंपरा चली आ रही है वैसा इतिहास कहता है कि मुगलों के प्रारंभिक काल में मुस्लिम शासक हिंदू मंदिर बनने नहीं देते थे बाबर के पश्चात आगे चलकर अकबर शासन आ जाने के बाद बनने लगे तब संवत् 1642 विक्रमी में अकबर के दरबारी रहीमखानखाना के खजांची दिल्ली निवासी भक्त सुंदर दास जी द्वारा राधाबल्लभ मंदिर का निर्माण हुआ इसके पहले ठाकुर जी छोटे से स्थान में रहते थे तब तक गोस्वामी जी के बड़े सुपुत्र वनचंद् जी सेवा संभाल चुके थे तथा एक जगह उल्लेख है कि पुराने मंदिर का निर्माण अकबर बादशाह की खजांची श्री सुंदर दास ने संवत 1626 में गोस्वामी जी से प्रभावित होकर लाल पत्थरों में कराया ऐसा वर्णन मिलता है कि गोस्वामी हित हरिवंश जी के तृतीय पुत्र श्री गोपीनाथ जी जो देव वन में ठाकुर रंगीलाल कि सेवा में रहते थे भक्त सुंदर दास उनके शिष्य थे। उस समय वृंदावन में राधा वल्लभ लाल की सेवा का भार बड़े लड़के गोस्वामी वनचंद् जी पर ही रहता था। देवबंद वाले गोस्वामी से मंदिर वृंदावन में बनने के लिए पूछा गया तो गोस्वामी वनचंद् जी ने कह दिया था 'ठीक है बनाना है तो बना लो किंतु मंदिर बनने के बाद जिस दिन ठाकुर पधारेंगे ठीक उसी दिन से ठीक एक वर्ष बाद इसी तिथि में बनवाने वाला मर जाएगा' इस बात का प्रायः प्रचार हो चुका था। एक बार राजा मानसिंह जयपुर वाले भी आए थे किंतु मृत्यु के भय से प्रस्ताव नहीं स्वीकारा गया। अतः वही मंदिर मानसिंह ने श्री रूप गोस्वामी के आदेश से गोविंद मंदिर के रूप में तैयार कराया जो की वृंदावन में स्थित एक भव्य मंदिर है। इधर देव इच्छा ! सुंदर दास जी ने गोस्वामी वनचंद्र जी की वह अटपटी सी सर्त सहर्ष स्वीकार कर ली अतः मंदिर तीन वर्ष में बनकर तैयार हो गया यद्यपि बादशाह से धन खर्च के विषय में दिल्ली तक शिकायत पहुंच गई किंतु उदरमाना खानखाना ने उल्टे और कह दिया कि मंदिर बनवाने में खजाने में से जितना धन चाहिए और ले जाओ कोई कमी निर्माण में नहीं रहनी चाहिए। अतः मंदिर बनकर तैयार हो गया विक्रम संवत 1641 की कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को राधावल्लभ लाल जी मंदिर में पधाराए गए देखते-देखते एक वर्ष बाद उसी कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी तिथि आ गई भक्त सुंदर दास सज धज कर नृत्य करते हुए अपना शौभाग्य समझते हुए गोस्वामी जी द्वारा लिखित 84 रचना का अंतिम पद 'बनी वृषभानु नंदिनी आज, पद गाने को कहा जैसे पूरा हुआ बस फिर क्या था! देखते-देखते भक्त सुंदर दास जी भी समाप्त हो गए सभी ऐसा चमत्कार देखकर आश्चर्यचकित रह गए। ऐसे परम सिद्ध सेवा पारायण गोस्वामी की अटपटी शर्त सुनकर तभी तो जयपुर राजा मानसिंह मृत्यु से भयभीत होकर राजी नहीं हुए थे। आगे चलकर औरंगजेब के आतंक के कारण 17वीं शताब्दी के आरंभ में जब सभी ठाकुर वृंदावन से स्थानांतरित हो रहे थे। उस समय श्री राधा वल्लभ जी भी विक्रम संवत 1727 में गोस्वामी श्री कमल नयन जी के शिष्य बृजलाल जी द्वारा ठाकुर आजानगढ़ (कामवन) चले गए। विक्रम संवत 1800 तक कामवन में रहकर पुनः वृंदावन वापस आ गए। उससे भी शताब्दी पूर्व श्री राधावल्लभ जी 50 वर्ष तक सेवा कुंज में भी विराजे थे। अब वृंदावन आकर एक वर्ष तक गदाधर भट्ट की गौशाला में विराजे। आता-ताइयों में मंदिर विध्वंस किया। औरंगजेब के 50 वर्ष बाद उन्हें अहमद शाह अब्दाली ने अखंड चार दिन तक खूब मारकाट लूटपाट मचाई सन 1757 मार्च को तीस हजार घोड़े ऊंट खच्चर पर लाद कर उस समय का बारह करोड़ रुपया सोना चांदी आदि ले गया।
परम भागवत गुजरात के श्री लल्लू लाल भाई ने विक्रम संवत 1771 में नवीन मंदिर का निर्माण करवाया वर्तमान में ठाकुर जी का श्री विग्रह इसी मंदिर में विराजमान है।