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श्री राधा श्याम सुंदर

एक बार कृष्ण दास नाम के एक संत निधिवन कुंज में सोहनी सेवा कर रहे थे तभी झाड़ू लगाते समय उन्हें एक नूपुर की प्राप्ति हुई यह राधा रानी का दिव्य नूपुर था जो कुंज में विचरण करते समय वहां गिर गया यह नूपुर कृष्ण दास ने अपनी धोती में बांध लिया इस नीलमणि युक्त दिव्य नूपुर का स्पर्श पाते ही उनका शरीर रोमांच से पुलकित हो गया और मन में सात्विक भाव उदय हुआ तभी ललिता सखी एक वृद्ध महिला का रूप रखकर वहां आई और कृष्ण दास से कहा कि कल मेरी वहू यहां आई थी जिसके पांव का एक नूपुर यहां गिर गया है क्या तुमको मिला है इस पर कृष्ण दास ने कहा हां मुझे एक नूपुर मिला है जब ललिता सखी ने कृष्ण दास से वह मांगा तो उन्होंने कहा कि मैं यह नूपुर आपको नहीं दूंगा आप अपनी बहू को यहां ले आइए मैं उनके दूसरे पांव का नूपुर देखूंगा यदि दोनों नूपुर सामान हुए तो मैं यह नूपुर स्वयं उन्हें प्रदान कर दूंगा इस बात पर बहुत देर तक चर्चा होती रही जब कृष्ण दास नूपुर देने को राजी नहीं हुए तब कृष्ण दास को मंजरी देव उपासना में सिद्ध पात्र जानकर श्री राधा रानी ने ललिता सखी को उन्हें अपना वास्तविक परिचय देने के लिए कहा ललिता सखी जब अपने वास्तविक रूप में उनके समक्ष प्रस्तुत हुई तो पहले तो कृष्ण दास उन्हें देखकर मूर्छित हो गए पुनः संभलकर नूपुर को माथे से लगाते हुए उनके सुपुर्द कर दिया कृष्ण दास को यह मालूम हुआ कि यह श्री राधे रानी का 'मंजू घोष' नामक नूपुर है तो उनकी दशा अत्यंत विह्वल हो गई तब राधा रानी ने ललिता सखी से कहा कि आप यह नूपुर इनके शीश पर स्पर्श कराएं और जैसे ही नूपुर को शीश पर स्पर्श कराया गया वह नूपुर कृष्ण दास के मस्तक पर तिलक के रूप में बदल गया किशोरी जी ने तुरंत अपने वक्ष स्थल का का कस्तूरी केसर मिश्रित मृगमद चंद्रकांति पाषाण पर घिसकर कर मंजरी स्वरूप कृष्ण दास के ललाट तिलक के मध्य एक उज्जवल बिंदु लगा दिया तिलक लगाते समय राधे जू ने कहा कि आज से यह तिलक श्याम मोहन के नाम से विख्यात होगा। ललिता सखी ने कृष्ण दास के उज्जवल कनक कांति युक्त स्वरूप को देखकर उन्हें 'कनक मंजरी' नाम से संबोधित किया जब श्री कृष्ण दास ने यह घटना वृतांत श्री जीव गोस्वामी जी को सुनाया तब श्री जीव गोस्वामी ने कहा कि आप को श्यामा जू का आनंद प्राप्त हुआ है इसलिए आज से आपका नाम श्यामानंद होगा। इन्हीं श्यामानंद को श्री श्याम सुंदर जी का प्रकट विग्रह 1578 ईस्वी में बसंत पंचमी वाले दिन प्राप्त हुआ इस विग्रह को वृंदावन में मंदिर बनाकर विराजमान किया गया एवं राधा रानी जी का विग्रह भरतपुर रियासत के तात्कालिक महाराज के रत्न भंडार से उपलब्ध हुआ है। राधा रानी ने राजा को स्वप्न दिया कि मेरे स्वामी श्री श्याम सुंदर वृंदावन में विराजित हो चुके हैं मुझे भी उनके पास पहुंचा दीजिए तब राजा ने राधा रानी के विग्रह को वृंदावन लाकर श्याम सुंदर के साथ धूम-धाम से उनका विवाह कराया और दोनों के लिए एक विशाल भव्य भवन बनवाया और उसमें दोनों विद्रोह को विराजमान कर दिया श्यामानंद प्रभु ने अपने गोलोक गमन से पूर्व इन विग्रहों को रसिकानंद प्रभु को सौंप गए जिनके वंशज लगभग 400 वर्षों से अधिक समय से आज भी उनकी सेवा कर रहे हैं वर्तमान में श्री कृष्ण गोपालानंद प्रभुपाद जी श्री राधा श्याम सुंदर जी के चरण सेवक हैं जिनकी भक्ति, ज्ञान एवं बृजवासियों के प्रति निष्ठा को देखकर बृज के प्राचीनतम संगठन श्री बृजवासी पंडा सभा द्वारा उन्हें 2024 में 'बृज विभूति' के गौरव से अलंकृत किया गया है चुकि यह विग्रह अत्यंत लघु थी इसलिए सन 1719 में तात्कालिक अंगसेवक गोस्वामी की अनुमति से श्री श्री बलदेव विद्याभूषण जी ने उड़ीसा प्रांत के निलगिरी नील गिरी शिला खंड द्वारा श्री श्याम सुंदर एवं राधा रानी का विशाल विग्रह निर्माण कराकर इस मंदिर में विराजित किया। आज श्री श्याम सुंदर जी के मंदिर में इन दोनों ही विद्रोह के दर्शन होते है।

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