श्री राधा वल्लभ लाल
श्री राधादामोदर जी का विग्रह श्री जीव गोस्वामी द्वारा सेवित है जिसे उनके गुरु श्री रूप गोस्वामी जी महाराज ने प्रदान किया था जो रिश्ते में श्री जीव गोस्वामी जी के ताऊ अर्थात् पिता के बड़े भाई थे। सवा सौ वर्ष श्री जीव गोस्वामी जी से सेवा लेकर औरंगज़ेब के आक्रमण काल के समय सन 1734 में जयपुर चले गए वहां हिम्मत राम नाजिर की हवेली में सेवित होने लगे लगभग 15 वर्षों के बाद श्री राधा दामोदर जी का विग्रह पुनः वृंदावन आया और सेवाकुंज के निकट मंदिर में स्थापित किया गया वृंदावन आने के 25 वर्षों बाद ज्येष्ठ शुक्ल नवमी को जयपुर में हिम्मत राम नाजिर की हवेली में पुनः नए विग्रह को स्थापित कर सेवा पूजा आरंभ की गई। आज भी राधा दामोदर दोनों जगह पर सेवा ले रहे हैं। वृंदावन स्थित मंदिर में श्री जीव गोस्वामी जी के ताऊ श्री सनातन गोस्वामी जो रूप गोस्वामी के बड़े भाई थे, द्वारा एक प्रदत्त एक गोवर्धन शिला है जो उनके द्वारा सेवित ठाकुर श्री मदनमोहन जी ने सनातन गोस्वामी को दी और कहा कि बाबा अब आप वृद्ध हो गए है तथा गोवर्धन की नित्य परिक्रमा करने में असमर्थ हैं आप जा शिला की चार परिक्रमा करों आप कुं गिरिराज परिक्रमा कौ ही पुन्य फल प्राप्त होगौ। इस शिला पर गाय के खुर, श्री कृष्ण के चरण तथा बांसुरी के चिन्ह विद्यमान हैं। आज भी गोवर्धन परिक्रमा लगाने में समर्थ भक्त इस मंदिर की चार परिक्रमा कर गिरिराज परिक्रमा का पुण्य फल प्राप्त करते हैं किंतु एक विचारणीय प्रश्न यह भी है कि जयपुर में सेवित श्री राधा दामोदर जी के मंदिर में भी एक ऐसी ही शिला विराजमान है। किंतु इस बात पर यह शंका कदापि नहीं करनी चाहिए कि कहां के ठाकुर असली है पदम पुराण के वाक्य 'वृंदावनम परित्यज्य पादमेकम न गच्छति' अनुसार भगवान वृंदावन छोड़कर कहीं नहीं जाते जिस प्रकार एक दीपक से दूसरा दीपक जलाने पर दोनों के गुण प्रकाश आदि में कोई अंतर नहीं होता इस प्रकार दोनों ही स्थान के ठाकुर में कोई अंतर नहीं है।