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श्री रंगनाथ मंदिर

वृंदावन का रंगनाथ मंदिर दक्षिण स्थापत्य कल में बना हुआ द्रविड़ शैली का एक विशाल मंदिर है। जो विशाल पांच पर कोटा से गिरा है। यह मंदिर उत्तर भारत का सबसे विशाल मंदिर कहा जाता है। 50 फुट ऊंचा सोने का गरुड़ स्तंभ इंद्रासन सोने के हाथी घोड़ा पालकी सिंह शार्दुल शेष हनुमान जी गरुड़ जी इत्यादि भगवान की सवारियां इस मंदिर के विशेष आकर्षण हैं समय-समय पर मंदिरों में अनेक उत्सव आयोजित होते हैं जैसे ब्रह्मोत्सव, बैकुंठ उत्सव,नंद उत्सव लट्ठा का मेला। गजग्राह उत्सव आदि। भगवान रंगनाथ के उत्सवों की संख्या इतनी है कि प्रतिदिन कोई उत्सव मंदिर में आयोजित होता है। ब्रह्मोत्सव इस मंदिर का प्रमुख उत्सव है जिसमें भगवान 10 दिन भक्तों को स्वर्ण एवं रजत जड़ित सवारियां जैसे हनुमान जी, गरुण जी, शेषनाग जी, पालकी, सिंह शार्दुल, सिंह,हंस, हाथी, घोड़े इत्यादि पर विराजमान होकर नगर भ्रमण भक्तों को दर्शन देते हैं। इस ब्रह्मोत्सव का विशेष आयोजन रथ का मेला होता है जो चैत्र कृष्ण नवमी को आयोजित होता है। भगवान रंगनाथ 50 फुट ऊंचे रथ पर बैठकर एक किलोमीटर दूर अपने बगीचे तक जाते हैं तथा पुनः लौटकर अपने मंदिर आते हैं रथ मेला के दूसरे दिन भगवान सोने के घोड़े पर विराजमान होते हैं जिस दिन बड़ी आतिशबाजी का भी आयोजन होता है।

मंदिर निर्माण

इस मंदिर का निर्माण लगभग 1845 में प्रारंभ हुआ जिसे बनने में लगभग 7 वर्ष का समय लगा पांच परिकुटों से घिरे हुए इस विशाल मंदिर में सन 1851 में रंगदेशिक स्वामी के कर कमल से हुई थी जो कि दक्षिण से बृज यात्रा को आए थे तथा ब्रज में ही वस गए। स्वामी जी की सत्प्रेरणा से लक्ष्मी चंद सेठ तथा उनके दोनों भाई राधा कृष्ण एवं गोविंद दास ने मंदिर का निर्माण कराया।

घटनाक्रम

लगभग 220 वर्ष से अधिक समय पहले दक्षिण से बालक रंगदेशिक स्वामी बृज आए उस समय गद्दी पर श्रीनिवासाचार्य विद्यमान थे। यहां पर श्रीनिवासाचार्य ने इनके पढ़ने लिखने की व्यवस्था की बड़े होने पर रंगदेशिक स्वामी का संयोगवश जैन परिवार से संबंध हो गया। जैन लक्ष्मीचंद सेठ बड़े भाई थे सबसे छोटे गोविंद बीच वाले भाई राधा कृष्ण जैन थे इन्हीं राधा कृष्ण जैन की लड़की से विधिवत रंगदेशिक स्वामी का विवाह हो गया। बाद में लक्ष्मी चंद सेठ तथा उनके दोनों भाइयों ने ही इनसे दीक्षा ली। एक बार रंगदेशिक स्वामी अपने ससुर राधा कृष्ण के साथ रंगनाथ भगवान के दर्शन करने दक्षिण यात्रा पर गए तथा वहां श्री रंगनाथ भगवान से गोदम्मा की तीसरी इच्छा वृंदावन निवास की प्रार्थना की बताते हैं कि रंगनाथ की मूर्ति ने अपनी मुस्कान द्वारा अनुमति प्रदान की तब मद्रास से 40 किलोमीटर पेरुम्बुदुर जिसे दिव्यदेश तथा महाभूत पूरी भी कहते हैं जहां रामानुजाचार्य का आविर्भाव हुआ था। आज भी यहां एक विष्णु मंदिर विशाल सरोवर के साथ निर्मित है। यहीं पर भगवान रंगनाथ की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम संपन्न हुआ उसके बाद विधि विधान से पूजा अर्चना करते हुए रंगनाथ जी को वृंदावन लाया गया सर्वप्रथम वृंदावन पहुंचकर अकुरूर घाट के पास भदरौड़ बगीची मैं विराजित हुए। बाद में कुछ समय के लिए लक्ष्मी नारायण मंदिर में रहे इसी बीच में ₹100 भूमि भाड़ा पर गोविंद देव से जगह पट्टे पर लेकर लक्ष्मी चंद जैन द्वारा दोनों भाइयों के सहयोग से एक विशाल मंदिर का निर्माण कराया गया तथा भगवान रंगनाथ को वहां विराजित किया गया।

भगवान रंगनाथ का परिचय

भगवान रंगनाथ एवं गोदम्मा साक्षात लक्ष्मी नारायण के स्वरूप हैं तथा भगवान श्री राम के कुल देवता हैं। भगवान राम के पूर्वज मनु पुत्र इक्ष्वाकु की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा ने इक्ष्वाकु की इष्ट पूर्ति के लिए भगवान रंगनाथ एवं गोदम्मा जी को विमान के साथ इक्ष्वाकु प्रदान किया। त्रेता युग के अंत तक भगवान राम द्वारा अयोध्या में भगवान रंगनाथ की सेवा पूजा की गई। भगवान राम के राजतिलक की उपरांत जब सभी आगंतुक राजा महाराजा अपने-अपने राज्य को लौट रहे थे तब विभीषण जी भगवान राम को छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं थे तब भगवान राम ने इष्टदेव रंगनाथ जी को विमान सहित विभीषण जी को प्रदान किया और कहा कि आप इन्हें लंका लेजाइए। आपको इनमें मेरे दर्शन होंगे किंतु स्मरण रहे कि विमान को कहीं भी रास्ते में रखना नहीं है यदि ऐसा किया तो भगवान रंगनाथ वहीं विराजित हो जाएंगे। लंका जाते समय किसी कारणवश विभीषण ने इस विमान को एक बालक को पकड़ने के लिए कहा वह बालक साक्षात गणेश जी थे जब आवश्यक कार्य पूर्ण कर विभीषण जी लौट कर आए तो देखा कि उसे बालक ने भगवान रंगनाथ के विमान को भूमि पर स्थापित कर दिया यह देखकर विभीषण जी को अत्यंत दुख हुआ उन्होंने विमान को उठाने का प्रयास किया किंतु राम जी के वचन अनुसार भगवान रंगनाथ वही कावेरी नदी के किनारे स्थापित हो गए। पूर्व में कावेरी नदी ने भी भगवान की तपस्या की थी तथा अपने आप को गंगा के समान बनाने के लिए प्रभु से अपने अंग में विराजमान होने की प्रार्थना की थी इस तपस्या के परिणाम स्वरूप यह घटना घटी विभीषण के दुखी होने पर रंगनाथ जी ने कहा कि आप लंका जाइए मैं लंका की ओर मुख करके हम यहां विराजमान रहूंगा साथ मनमान्तर के उपरांत में अपने बैकुंठ धाम जाऊंगा जहां आप भी मेरे साथ चलोगे वृंदावन विराजमान रंगनाथ भगवान कावेरी नदी के किनारे पर स्थित श्रीरंगम भगवान के ही स्वरुप हैं।

रंगनाथ भगवान के मंदिर के विषय में वृंदावन के परम विद्वान ब्राह्मण वृंदावन बिहारी मिश्र 'बिंदु पंडित जी' ने लिखा है कि

रंगनाथ के रंग निराले शान बान सब न्यारी है,
गोदा रंगनाथ मलिक की अपनी ही जमींदारी है,
रंगनाथ सरकार दिव्य हर चीज वस्तु सरकारी है,
द्वार द्वार पर इंतजाम को रहती चौकीदारी है।
ट्रस्ट कमेटी दफ्तर में लिखा पड़ी है काम की,
ब्रज में बिंदु बखाने महिमा श्री वृंदावन धाम की,
सोने को खंभ बीस गज ऊँचो छठा विश्व के नारी है।
ब्रह्मोत्सव सोने के हाथी घोड़ा चले सवारी है।
रथ को मेला आतिशबाजी होरी की पिचकारी है।
वैकुंठोत्सव रत्न जड़े सिंगार करैं सूखकारी है।
गोदा रंग विवाह उत्सव है मकर पर्व अभिराम की।
ब्रज में बिंदु बखाने महिमा श्री वृंदावन धाम की।
रंगनाथ लट्ठा का मेला नंद उत्सव में दिखलाते हैं।
कल्पवृक्ष की छाया में बैठे रंगनाथ जी आते हैं।
पंद्रह गज लट्ठा पर चढ़ने युवक बुलाए जाते हैं।
चढ़ ना सके ऊपर से पानी चीकट तेल गिरते हैं।
ऊपर चढ़े वही जे बोले रंगनाथ के नाम की।
ब्रज में बिंदु बखानै महिमा श्री वृंदावन धाम की।
गजग्राह का युद्ध होता जब विपदा गज पर भारी है।
रंगनाथ रक्षा करने आ जाते गरुड़ सवारी है।
भाद्र शुक्ल नौका बिहार होता मन को सूखकारी है।
बामन बारस बामन छवि धरते श्री रंग मुरारी है।
एक ही रात में होरी दिवारी होती प्रभु के धाम की।
ब्रज में बिंदु बखानै महिमा श्री वृंदावन धाम की।

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