श्री राधा गोविंद देव जी
श्री वृंदावन धाम की अधिष्ठात्री देवी श्री वृंदा रानी की कृपा से भगवान श्री कृष्ण वृंदावन में गोविंद रूप में विद्यमान है जो संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं श्री गोविंद देव विग्रह में भगवान श्री कृष्ण की आयु 14 वर्ष की किशोर अवस्था में है यह विग्रह श्री बज्रनाभ द्वारा प्रतिस्थापित है जो लगभग 4500 वर्ष पुराना है आज जहां मंदिर है वहां कभी गोमा टीला हुआ करता था। आता ताई आक्रांताओं के आक्रमणों के भय के कारण यह विग्रह हजारों वर्ष इसी टीले में दबी रही। 500 वर्ष पूर्व इनका प्रकट श्री रूप गोस्वामी जी की कृपा से माघ शुक्ल पंचमी विक्रम संवत 1552 मैं हुआ उत्खनन कर्ताओं ने प्रत्यक्ष अनुभव किया कि भूमि गीली पड़ी है। क्योंकि ना जाने कब से एक गाय नित्य आकर यहीं पर दूध चुचा जाती थी गुप्त रूप से यही इनका भोग आहार था।
विग्रह परिचय
श्री कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने श्री शांडिल्य मुनि के कथन अनुसार विश्वकर्मा से कहकर अनेक देवी देवताओं के विग्रहों का निर्माण करवाया जिम गोविंद, गोपीनाथ और मदन मोहन की विग्रह प्रमुख हैं श्री अनिरुद्ध पत्नी बज्रनाभ की मां जिन्होंने श्री कृष्ण को साक्षात देखा था इन श्री विग्रहों के तैयार हो जाने के पश्चात उन्होंने देखकर कहा की गोविंद देव जी का मुख गोपीनाथ जी का वक्षस्थल एवं मदन मोहन जी के चरण हू ब हू श्री कृष्ण से मिलते हैं यही गोविंद देव जी को 17वीं शताब्दी में विधर्मी औरंगजेब के आक्रमणों के कारण तात्कालिक सेवायत श्री शिवराम गोस्वामी ने ले जाकर आमेर नरेश मिर्जा राजा जयसिंह कि पुत्र राम सिंह प्रथम की देखरेख में सन 1669 ई में कामबन में स्थापित कर दिया वहां शहर बसने के बाद सन 1772 ईस्वी में सवाई जैसिंह पुनः कामवन से अपने निवास चंद्र महल जयपुर ले गए जो 1734 से जयपुर में विराज रहे हैं।
गोविंद देव जी का प्रथम प्रादुर्भाव
सर्वप्रथम श्री गोविंद देव जी का प्रादुर्भाव ईशा से 320 ई. पूर्व गुप्त वंशजों द्वारा हुआ उसके बाद सन 1018 ई के आसपास महमूद गजनबी ने आक्रमण किया जिसके डर से बृजवासियों ने इस विग्रह को गोमाटीला में छुपा दिया फिर यह स्थान निर्जन और झुरमुट हो गया कितने शासन आए और गए एक बहुत लंबा समय चला किंतु जब 1537 ई. में चैतन्य महाप्रभु आए उनकी प्रेरणा से वृंदावन भूमि का उद्धार एवं विग्रह प्रकट क्रम पुनः आरंभ हुआ जिसमें श्री रूप गोस्वामी पाद को स्वप्नादेश हुआ उनकी प्रेरणा से संवत 1592 में गोविंद देव विग्रह का प्रादुर्भाव किया गया।
राधा रानी का आगमन
पहले श्री गोविंद देव जी अकेले ही थे 17 वर्षों के बाद राधा रानी उड़ीसा से चलकर गोविंद देव के भाई और स्थापित हो गई एक बार 16वीं शताब्दी में यवनों के भय राधा विग्रह रूप को बृज वृंदावन यात्रा पर आए हुए उड़ीसा के एक बृहदभानु नामक सद्गृहस्थ वैष्णव ब्राह्मण अपने साथ घर ले गए उन्होंने बड़े चाव से घर पर राधा विग्रह की पूजा की उनके मरने के बाद लोगों द्वारा उचित सेवा ना संभाल पाने के कारण मूर्ति राजा प्रताप रुद्र के पास भेज दी गई राजा ने लक्ष्मी की मूर्ति समझकर श्री जगन्नाथ जी के बांई ओर चक्रवेड़ नामक स्थान पर विराजमान कर दिया उन दिनों एक विचित्र चमत्कार हुआ एक ही समय राजा प्रताप रुद्र के पुत्र राजकुमार पुरुषोत्तम को एवं श्री गदाधर गोस्वामी के शिष्य को एक साथ स्वप्न हुआ कि मेरे प्राणनाथ श्री वृंदावन में प्रकट हो चुके हैं मैं लक्ष्मी नहीं हूं मुझे तुरंत वृंदावन भेज दो ऐसा एक साथ स्वप्नादेश सुनकर राजा ने तुरंत पालकी में गदाधर के शिष्यों द्वारा श्री राधा विग्रह वृंदावन के लिए भेज दिया सभी वैष्णवन ने श्री वृंदावन पहुंचकर बड़े भव्य स्वागत समारोह के साथ 1553 ईस्वी में विवाह महोत्सव मनाते हुए श्री गोविंद देव के भाई और श्री राधा विग्रह को स्थापित कर दिया।
मंदिर निर्माण
श्री रूप गोस्वामी पाद ने सन 1565 में जयपुर के राजा मानसिंह द्वारा प्रेरणा देकर लाल पत्थरों से भव्य मंदिर का निर्माण कराया। जो अष्टदल युक्त कूर्माकार योगपीठ के आधार पर 12 वर्षों में बनकर तैयार हुआ इस प्राचीन मंदिर के निर्माता कूर्म कुल पृथ्वी राजाधिराज वंशज महाराज भगवान दास जी के सुपुत्र राजा मानसिंह थे कामदार श्री कल्याण दास आज्ञाकारी मानिकचंद चोपड़ा शिल्पकार गोविंद दास दिवाले कारीगर गणेश दास तथा विमल दास ने मुख्यतः मंदिर कार्य 12 वर्षों में पूर्ण किया। आमेर की राजा मानसिंह ने योग पीठ का निर्माण करा कर श्री गोविंद देव जी के लिए आभूषण तथा पोशाकें आदि भेंट की। यह योग पीठ के आधार पर बना हुआ उत्तर भारत का सबसे विशाल मंदिर है पहले यह मंदिर सात मंजिला था बाद में आक्रांता औरंगजेब द्वारा ऊपर से तोड़ दिया गया वर्तमान में यह मंदिर तीन मंजिल का है। कहा जाता है इसी मंदिर के मलवे से मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण हुआ इस मंदिर के पत्थर एक स्थान पर पड़े हुए रहने के कारण एक मोहल्ले का नाम पत्थर पुरा पड़ गया।