श्री गोकुलानंद जी
श्री गोकुलानंद मंदिर वृंदावन में राधा रमन मंदिर जी के बराबर स्थित है जिसकी सेवा पूजा राधा रमण जी की गोस्वामी श्री युत श्री वत्स गोस्वामी जी के द्वारा की जाती है। इस मंदिर में तीन ठाकुर विराजमान हैं पहले लोकनाथ जी द्वारा सेवित विग्रह राधा विनोद जी दूसरे श्री विश्वनाथ जी द्वारा सेवत विग्रह गोकुलानंद जी एवं तीसरे श्री रघुनाथ गोस्वामी जी द्वारा सेवित गिर्राज शीला।
सर्वप्रथम इस मंदिर में श्री श्री लोकनाथ गोस्वामी द्वारा सिविल विग्रह राधा विनोद जी विद्यमान थे जो छत्र वन वर्तमान में छाता नमक कस्बे के पास उमराया आया नामक गांव के किशोरी कुंड से प्रकट हुए थे। लोकनाथ गोस्वामी जी ने बहुत समय तक वहीं पर विग्रह विराजित कर उनकी सेवा की। श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के कहने पर श्री भूगर्भ गोस्वामी एवं लोकनाथ गोस्वामी जी एक साथ 1565 में ब्रजमंडल आए और कृष्ण लीलाओं की खोज में लग गए। इसी दौरान उन्हें किशोरी कुंड से श्री राधा विनोद जी का विग्रह प्राप्त हुआ। अधिक वृद्ध हो जाने पर प्रभु के आदेश अनुसार वृंदावन आ गए और चीर घाट निकट छोटी सी कुटिया बनाकर श्री विग्रह की सेवा करने लगे। औरंगजेब की आक्रमण कल में सन 1700 में ठाकुर श्री राधा विनोद जी जयपुर चले गए एवं राजा सवाई प्रताप सिंह के यहां उच्च पद पर अधिकारी शालिग्राम विजय वर्गीय,जो नि संतान थे उन्होंने अपना आवास महल श्री राधा विनोद जी को दान कर दिया उनकी हवेली राधा विनोद जी का मंदिर बन गई।
ठाकुर गोकुलानंद जी का प्राकट्य काल 1600 ई.के आसपास है जैसा कि पूर्व में बताया गया है कि विश्वनाथ चक्रवर्ती द्वारा सेवित विग्रह पूर्व में राधा कुंड में था जहां श्री विश्वनाथ गोस्वामी ठाकुर गोकुलानंद की सेवा किया करते थे। उनका संकल्प था कि वे राधा कुंड छोड़कर बाहर नहीं जाएंगे किंतु काल प्रभाव के कारण जीव गोस्वामी जी के गोलोक सिधारने के बाद कुछ परिस्थिति बस विशुद्ध बृज भक्ति को स्थापित करने के लिए उन्हें वृंदावन आना पड़ा आपके योगदान एवं अनन्य भक्ति के कारण बृजवासी आपको श्री रूप गोस्वामी का अवतार मानने लगे अपने ईष्ट श्री गोकुलानंद जी को लेकर वृंदावन आकर श्री राधा विनोद जी के साथ ही गोकुलानंद जी की सेवा करने लगे। इसी समय राज्य प्रशासन में उथल-पुथल मचने के कारण और चौरासी कोस बृज मंडल में समस्त देवालयों एवं ग्रंथ आदि का संरक्षण आपके सानिध्य में होने लगे इस कारण आपसे ही गोकुल आनंद मंदिर विख्यात हो गया। अचंभित करने वाली बात लगती है कि ठाकुर राधा विनोद जी के पूर्व से विराजित होने पर भी इस मंदिर का नाम गोकुलानंद इसलिए पड़ा क्यों कि औरंगजेब के शासनकाल में ठाकुर राधा विनोद जी का विग्रह यहां से जयपुर चला गया और गोकुलानंद जी उस समय राधा कुंड में सेवा ले रही थे। इसलिए वे जयपुर नहीं गए बाद में वृंदावन में स्थापित हुए इसी कारण इस मंदिर का नाम गोकुल आनंद नाम से विख्यात हुआ। जो गौड़िया संप्रदाय की प्रमुख सप्त देवालयों में एक है।