श्री मदन मोहन
जयतां सुरतौ पंगोर्मम मंद मतेर्गति।
मत सर्वस्व पदाम्भोजौ राधा मदन मोहनौ
मुझे जैसे लंगड़े एवं मंदबुद्धि वाले की एकमात्र जो गति है एवं जिनके चरण कमल ही मेरे सर्वस्व है ऐसे उन परम दयाल श्री मदन मोहन की जय हो यह मंदिर श्री सनातन गोस्वामी की सद प्रेरणा से तैयार हुआ श्री मदन मोहन ठाकुर का वृंदावन धाम में सन 1590 ईस्वी में हुआ मंदिर निर्माण सन 1592 के आसपास मुल्तान निवासी रामदास कपूर द्वारा हुआ सन 1670 ईस्वी में औरंगजेब द्वारा यह मंदिर तोड़ा गया यहां के शिलालेख से विदित होता है कि मंदिर का पुनर्निर्माण महाराजा प्रताप आदित्य के भाई और राजा बसंत राय के पिता राजा गुणानंद ने कराया। पहले प्राचीन मंदिर भग्नावशेष दशा में लाल पत्थर में बना हुआ अपनी प्राचीनता का परिचय दे रहा था इसकी ऊंचाई 57 फीट तथा जगमोहन की चौड़ाई 22 फीट है वर्तमान में मंदिर पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है ठाकुर के नाम कितने ही गांव से मिलाकर कुल 435 बीघा जमीन सेवा में अकबर बादशाह ने लगा दी थी मंदिर यवनों द्वारा ध्वंस होने से ठाकुर श्री मदन मोहन जी के राजस्थान करौली चले जाने की पश्चात वृंदावन प्राचीन मंदिर में वर्तमान निमाई निताई विग्रह विराजित है सबसे प्राचीन मंदिर वृंदावन का यही है सन 1819 में श्री गोविंद गोपीनाथ की भांति प्राचीन मंदिर के पास यहां भी नया मंदिर बनवाया गया जिसमें मदन मोहन की प्रतिरूप विग्रह विराजित है।
जैसा कि पूर्व विदित है की कृष्ण के प्रपौत्र श्री वज्र नाभ जी द्वारा श्री कृष्ण की विभिन्न लीला स्थलों का नामकरण तथा विविध कुंड सरोवर आदि के अतिरिक्त उनके द्वारा श्री गोविंद, गोपीनाथ, मदन मोहन,श्रीनाथजी ,बलदेव, हरदेव, केशव देव आदि विविध विग्रह की स्थापना ब्रज मंडल के विविध स्थान पर हुई उन्हें में से यह मदन मोहन जिनके चरण अरविंद को देखकर श्री बज्र नाभ की मां उषा ने कहा था की मदन मोहन के चरण बिल्कुल कृष्ण से मिलते हैं श्री कृष्ण के बाद के 5000 वर्ष से लेकर ईशा के 16वीं शताब्दी के अंतराल में आक्रमणकारियों से बचने के लिए कितनी ही बार ठाकुरों को भूमिगत होना पड़ा यह बता पाना असंभव है। बाद में भक्ति काल में अनेक संत महापुरुषों की सत्प्रेरणा से इन विग्रहों को भूमि से बाहर निकला गया। मदन मोहन विग्रह प्राकट्य श्री अद्वेताचार्य महाप्रभु की प्रेरणा से हुआ।
घटनाक्रम कुछ इस प्रकार है की अद्वैता चार महाप्रभु अपने माता-पिता की मृत्यु उपरांत पिंडदान करने के लिए आए इस दौरान उन्होंने ब्रजमंडल यात्रा की जिसमें वृंदावन के मनोरम दृश्य को देखकर व्याकुल हो उठे उन्होंने आदित्य टीले पर स्थित एक वट वृक्ष के नीचे विश्राम किया इस वट को अद्वेतवट के नाम से जाना जाता है तभी भुवन मोहिनी स्वरूप ठाकुर श्री मदन मोहन ने अद्वैत महाप्रभु जी को सपना दिया कि मैं कुब्जा द्वारा सेवितत ठाकुर हूं और सैकड़ो वर्षों से भूमि के अंदर हूं मुझे इस भूमि से बाहर निकालो तब अद्वैत महाप्रभु ने बृजवासियों को साथ लेकर मदन मोहन के विग्रह को भूमि से प्रकट किया एवं आदित्य टीले पर झोपड़ी बनाकर विराजमान किया और पूजा सेवा की जिम्मेदारी बृजवासियों को दी और कुछ समय बाद महाप्रभु ब्रज भ्रमण के लिए पुनः लेकिन जब वे पुन: वृंदावन आए तो उन्होंने देखा की बृजवासियों ने मलिच्छ यवनों के डर से मदन मोहन की विग्रह को झाड़ियां में छुपा दिया है यह देखकर अद्वेत महाप्रभु को अत्यंत दुख हुआ उसी रात ठाकुर जी ने उनको स्वप्न दिया कि इस स्थान पर अभी कुछ समय तक यवनों का आतंक बना रहेगा अतः कल श्री परशुराम चतुर्वेदी नामक ब्राह्मण मथुरा से यहां आएंगे आप मुझे उन्हें समर्पित कर दें और ललिता सखी द्वारा निर्मित मेरा एक चित्रपट जो सेवा कुंज में स्थित है उसे अपने साथ शांतिपुर बंगाल ले जाओ और वहां के भक्तों का उद्धार करो अद्वैत गोस्वामी ने ऐसा ही किया प्रातः काल जब परशुराम चतुर्वेदी ब्राह्मण वृंदावन आए तो विग्रह को उन्हें समर्पित कर दिया और स्वयं शांतिपुर बंगाल चले गए।
कालांतर में बंगाल के शासक हुसैन शाह का मंत्रित्व पद त्याग कर दो भाई रूप और सनातन वृंदावन पहुंचे वे परम त्यागी थी उनके विषय में श्री कृष्ण दास कविराज गोस्वामी लिखते हैं
एक एक वृक्ष तले एक एक दिन वास
कभू चना चर्वन और कभू उपवास
वे दोनों भाई इसी स्थान पर आकर रहने लगे उस समय यहां घना जंगल था और संत लोग भिक्षा मांगने के लिए मथुरा जाया करते थे। उस दौरान सनातन गोस्वामी मधुकरी के बहाने मदन मोहन जी के दर्शन करने के लिए परशुराम चतुर्वेदी जी के घर जाने लगे एक दिन उन्होंने देखा चतुर्वेदी जी की वधू अत्यंत सहज भाव से मदन मोहन की सेवा कर रही थी उसे आचार विचार का कोई विचार नहीं था यह देखकर सनातन गोस्वामी जी को दुख हुआ उन्होंने जब कई बार इसी प्रकार बिना आचार विचार के ठाकुर जी की सेवा देखी तो एक दिन क्रोधित होकर उस पंडितानी को डांट दिए जब दूसरे दिन सनातन गोस्वामी उसके द्वारा पर भिक्षा करने गए उन्होंने देखा की मदन मोहन उसके बालकों के साथ भोजन कर रहे थे एवं उनकी जूठन खा रहे थे यह देखकर सनातन गोस्वामी को बड़ा ही आश्चर्य हुआ और कुछ ही समय बाद उन्हें बृजवासियों की सहज भाव का ज्ञान हो गया उन्होंने उस झूटन को प्रसाद के रूप में चतुर्वेदी जी की पत्नी से मांगा जिसे खाकर सनातन गोस्वामी मूर्छित हो गए तभी स्वप्न में मदन मोहन जी ने आदेश दिया कि आप हमें अपने साथ वृंदावन ले चलें इस पर सनातन गोस्वामी जी ने कहा हम तो ठहरे मधुकरिया हम तो भीख मांग करके अलोनी बाटी खाने वाले हैं हम आपकी सेवा किस प्रकार कर पाएंगे जब मदन मोहन जी ने कहा कि मैं भी आपके साथ आलोनी बाटी खाने को तैयार हूं पर बाबा मुझे आप अपने साथ वृंदावन ले चलो तब चेतना आने पर चतुर्वेदी जी की वधु को सारा वृत्तांत बताकर वे मदन मोहन की विग्रह को पुनः1590 ईस्वी में वृंदावन ले आए और यहां आदित्य टीले पर विराजित कर दिया और भिक्षा में लाए हुए आटे की आलोनी बाटी बनाकर मदन मोहन का भोग लगाने लगे एक दिन ठाकुर जी ने सपने में कहा की बाबा में कब तक आलोनी बाती खाऊंगा कहीं से थोड़ी नमक की व्यवस्था कर दो तब सनातन गोस्वामी जी ने कहा कि हम पूर्व ही आपसे यह कह कर लाए थे कि हमारे यहां कॉलोनी बाटी ही है यदि आपको नमक चाहिए तो उसकी व्यवस्था आप स्वयं करें सनातन गोस्वामी से मुख से यह बात सुनकर मदन मोहन ने कहा बाबा क्या मैं अपनी व्यवस्था स्वयं कर लूं और यह कहकर हंसने लगे फिर क्या था दूसरे दिन मुल्तान के व्यापारी रामदास कपूर की एक सामान से भरी हुई नाव यमुना के भवर में आ फसी सभी लोग बचाओ बचाओ की आवाज लगाने लगे तभी सामने झाड़ी में उन सबको एक सुंदर सा बालक दिखाई दिया जो कह रहा था की ऊपर टीले पर सनातन बाबा भजन कर रहे हैं आप उनके नाम की दुहाई लगाओ वह आपकी रक्षा करेंगे यह सुनते ही सभी लोग सनातन बाबा बचाओ सनातन बाबा बचाओ कहकर चिल्लाने लगे और देखते ही देखते ठाकुर जी की कृपा से नाव किनारे लग गई रामदास व्यापारी ने सोचा की जिनकी कृपा से आज जान बची है क्यों ना उनके दर्शन किए जाएं और वह सनातन गोस्वामी जी के दर्शन करने के लिए ऊपर गए तब उन्होंने बाबा सनातन गोस्वामी जी को सारा वृत्तांत बताया और उनकी कुटिया में मदन मोहन की विग्रह को देखकर वह समझ गए कि उनकी रक्षा करने वाले स्वयं ठाकुर मदन मोहन ही थे फिर क्या था रामदास कपूर ने मन में सोच लिया कि इस व्यापार यात्रा में जो भी मुनाफा होगा उससे मैं यहां मंदिर का निर्माण कराऊंगा तब 1592 ई के आसपास आगरा से लौटकर रामदास कपूर ने मदन मोहन जी के अत्यंत ऊंचे मंदिर का निर्माण कराया। और भूख राज हेतु संपत्ति भी दान की यह वृंदावन का सबसे प्राचीन मंदिर है और वृंदावन की पहचान भी इसे वृंदावन का सिग्नेचर टेंपल भी कहा जा सकता है बाद में फिर 1597 ई के पश्चात गाजापति राजा प्रताप रुद्र के पुत्र राजा पुरुषोत्तम देव ने श्री वृंदावन धाम में मदन मोहन को अकेला सुनकर उड़ीसा से दो मूर्तियां भेज दी वही मूर्ति दाएं ओर ललिता जी की तथा बाई और छोटी मूर्ति श्री राधा जी की भी विराजित है तभी से ठाकुर का नाम मदन गोपाल से बदलकर राधा मदन मोहन पड़ गया।