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श्री गोपेश्वर महादेव

यमुना जी के किनारे बंसीवट के निकट गोपेश्वर महादेव बृज के उन चार महादेवों में एक हैं जिनको श्री कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने लगभग ४५०० हजार वर्ष पूर्व स्थापित किया था मान्यता है जिस समय भगवान ने वृंदावन वंशीवट पर महारास किया तब मुरली की धुन भगवान शिव के कैलाश तक सुनाई दी जिससे महादेव समाधि भंग हो गई। महादेव महारास देखने की लालसा लेकर पार्वती के साथ वृंदावन पधारे किंतु वृंदा देवी की आज्ञा से गोपियों ने पार्वती मां को तो में प्रवेश करने दिया किंतु भगवान शिव को यह कहकर रोक दिया कि इस महारास में किसी भी पुरुष का प्रवेश वर्जित है यहां केवल एक ही पुरुष है हमारे श्री कृष्ण। श्री ललिता सखी के कहने पर महादेव यमुना मैया के पास गए और उनकी कृपा से नारी रूप धारण किया नारी रूप धारण कर गोपी बनकर भगवान महारास में प्रवेश कर गए किसी ने पहचाना नहीं जब भगवान ने अपनी मुरली बजाई तो महादेव सुदभुद भूल कर नृत्य करने लगे जिससे उनका वास्तविक स्वरूप प्रकट होने लगा तब श्री कृष्ण ने महादेव को गोपेश्वर कहकर संबोधित किया और कहा 'पधारो गोपेश्वर'। राधा रानी ने जब यह सुना कि किसी अन्य सखी को भगवान ने गोपेश्वर यानी गोपियों के ईश्वर कहकर संबोधित किया है मुझे कभी भी इस संबोधन से नहीं पुकारा तो इस घटना क्रम से राधा रानी नाराज होकर यमुना के उसे पर एक स्थान पर मान करके बैठ गई जहां उनके अश्रुओं(आंसुओं)से एक सरोवर का निर्माण हुआ जिसे मानसरोवर के नाम से जाना जाता है। जो वृंदावन में यमुना के उसे पर आज भी स्थित है। भगवान श्री कृष्ण राधिका को मनाने के लिए मानसरोवर गए और वहां राधा रानी से अनुनय विनय कर महादेव के सत्य को राधा रानी को बताया जिस पर राधा रानी महादेव से अति प्रसन्न हुई। महादेव ने इच्छा जताई की कि वह वृंदावन में राधा कृष्ण के चरणों में सदा के लिए निवास चाहते हैं तब श्री कृष्ण ने तथास्तु कह कर यमुना के किनारे महादेव को गोपेश्वर महादेव के रूप में स्थापित किया। इसी लिंग को बाद में कृष्ण की प्रपौत्र बज्रनाभ द्वारा लता पताओं से खोज कर मंदिर में स्थापित किया गया तब से ही यह मंदिर वृंदावन में स्थित है जो लगभग ४५०० वर्ष पुराना है।

शरद चंद्र की पूर्णिमा, श्री कृष्ण रचो महारास
अपनों अपनों श्याम हत, इक इक गोपी पास
मोहन की माया मची, चहूं दिश दिव्य प्रकाश
कल कल कालिंदी वहै, वंशीवट के पास
महाकाल गोपी बनो, हिये लिए कछु प्यास
मां गौरी कूँ साथ ले, तजि आयो कैलाश
दिव्य दृश्य को देखकै, देवन हृदय उलास
एक छोटी सी पीर भी, गोपी होते काश
धन्य धरा जा धाम की, रज राधे को बास
संतन की सत कामना, रज होवन की आश
मीरा हो रसखान हो, सूर्य, बिहारी, ब्यास
कुंज विहारी लाल कूँ सेवत श्री हरिदास
उलटी गंगा बह रही यमुना जी के पास
राम-राम कबीरा जपें, श्याम कूँ तुलसीदास
राघव मन की कामना, मन मोहन से आश
जनम जनम मोहे दीजिओ, श्री वृंदावन वास

पंडित वृंदावन बिहारी मिश्र 'बिंदु जी' ने 'वृंदावन वैभव दर्शन' नामक पुस्तक में लिखा है....
रास रचाया श्री कृष्ण ने मुरली धुन को लहराया।
सात आवरण भेद प्रभु ने फैलाई अपनी माया।
कैलाश वासी अविनाशी शंकर जी ने सुनपाया।
शंकर गोपी बने नाचने लगे प्रेम रस बरसाया।
शिव के गोपी रूप की झांकी गोपेश्वर के नाम की।
ब्रज में बिना भागने महिमा शिव वृंदावन धाम।

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