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श्री गोपीनाथ जी

श्रीमान रास रसारंभी वंशी वट तट स्थित:
कर्षण वेणुस्वनैर्गोपी गोपीनाथ: श्रियोअस्तुन:

अपनी मुरली की मधुर ध्वनि से गोपियों के मन को आकर्षित करने वाले बंसी वट पर स्थित, रास रस के प्रवर्तक एवं प्रेम रस के रसिक गोपीनाथ जी आप हमारा मंगल करें।

श्री राधा गोपीनाथ जी संत गदाधर जी के परम शिष्य मधु पंडित द्वारा सीमित ठाकुर हैं जिनका प्रकट कल सन 1536 ई के आसपास बंसी भट्ट स्थान से माना जाता है मधु पंडित जी ने नवदीप से वृंदावन आकर भजन किया हुआ राधा गोपीनाथ जी की सेवा की।

उनके गुरु गदाधर जी परम बैरागी थे बैराग लेने से पूर्व जब उनको ज्ञात हुआ की गौरांग महाप्रभु सन्यास ले रहे हैं तो वह स्वयं उनसे पहले ही काशी जाकर संन्यास ले लिए महाप्रभुजी के पूरी प्रस्थान के पश्चात यह भी उनके साथ पुरी चले गए। और वहां क्षेत्र संन्यास ले लिया। बाद में महागुरु जी के वृंदावन आने लगे लगे तब गदाधर जी विचलित हो गई उनकी मनोदशा को देख महाप्रभुजी ने गोपीनाथ जी की विग्रह को प्रकट कर उनको दिया तब से वह पुरी में उनकी सेवा करने लगी उन गोपीनाथ जी के मंदिर को आज भी टोटा गोपीनाथ के नाम से पूरी में जाना जाता है। कालांतर में जब संत गदाधर जी बूढ़े हो गए तो उनकी पीठ पर कुंवङ निकल आया जिससे उन्हें प्रभु की सेवा करने में परेशानी होने लगी अपने भक्त की पीड़ा को देखकर गोपीनाथ जी अपने कद को छोटा करने के लिए पलटी मारकर बैठ गए।

अपने गुरु की ऐसी सेवा से प्रेरित होकर मधु पंडित जी के मन में भी वृंदावन आकर सेवा करने की प्रेरणा हुई उसे समय वृंदावन में लुके छुपे ठाकुर यहां वहां से प्रकट हो रहे थे तब मधु पंडित जी के भाव के अनुरूप गोपीनाथ जी राधा रानी के साथ बंसीवट स्थान पर प्रकट हुए। भक्ति रत्नाकर नामक ग्रंथ में श्री नरहरि चक्रवर्ती पाद ने वर्णित किया है कि...

राधिका सह गोपीनाथेर प्रकट।
पूर्वेजनाइलो वंशीवटेर निकट।

झोपड़ी डालकर मधु पंडित लगभग 40 वर्षों तक अपनी कुटिया में राधा गोपीनाथ जी की पूजा करते रहे बाद में अकबर बादशाह के दरबारी खंडेले राजा रायसल शेखावत ने अपनी श्रद्धा से लाल पत्थर का मंदिर बनवाकर मंदिर में इन्हीं राधा कृष्ण विग्रह को स्थापित किया यह मंदिर बादशाह अकबर की ब्रज यात्रा सन 1573 ई के बाद बना यह गोपीनाथ जी का मंदिर राधा रमन जी के ठीक पूर्व ओर पास में विराजित है श्री गोपीनाथ जी की दाएं और विराजमान विग्रह श्री राधा रानी जी का है जो साथ प्रकट हुआ था दूसरा विग्रह भी श्री राधा रानी जी का है जो नित्यानंद जी की पत्नी जान्ह्वा देवी ने गोद देश बंगाल से श्रीधाम वृंदावन भेजा था वहां मूर्ति बाई और बढ़ाई गई कारण यह था कि नित्यानंद जी की पत्नी जान्ह्वा देवी को स्वप्न हुआ था जिसमें गोपीनाथ जी ने उनसे कहा कि मेरी राधा रानी की विग्रह अत्यंत छोटी है इसलिए मेरे समान ऊंचाई की विग्रह यहां पधराओ।

कालांतर में औरंगजेब के द्वारा सन 1669 ईस्वी में फरमान जारी करने के पश्चात मधु पंडित जी द्वारा इन विग्रहों को राधाकुंड होते हुए काम में ले जाया गया वहां बंगाल प्रांत की जिला वर्धमान के राजा त्रिलोक चंद्र तथा रानी भानुमति ने सन 1747 ईस्वी में एक विशाल भव्य श्री गोपीनाथ जी का मंदिर कामा में बनवाया उसी समय प्रसन्न होकर कामा विराजमान ठाकुर श्री गोपीनाथ जी को भोग राग के लिए जयपुर के वर्तमान महाराजा ईश्वरी सिंह और माधव सिंह प्रथम ने हिंडौन परगना में डेहरा नामक गांव भेंट किया मुगल साम्राज्य पतन के कगार पर खड़ा हुआ जब तेजी से औरंगजेब के बाद बिखरने लगा और खिराज वसूली को शाही सैना कभी जयपुर कभी भरतपुर कभी अलवर आदि जगह कूच करने लगी। इस समय कामा की भी स्थिति बिगड़ गई ऐसे में कामा का शाही दुर्ग ( जो वर्तमान भग्नावशेष रूप में दिख रहा है )सन 1775 ईस्वी में रहीम दाद खान नामक शाही सैना नायक के हाथ आ गया सन 1770 से 1778 ई के बीच शाही सैनिक एवं कतिपय शेखावत सरदारों में भीषण मुठभेड़ हुई परिणाम स्वरूप कामा का पतन हो गया ऐसे समय में शेखावत श्री गोपीनाथ जी को लेकर जयपुर की ओर चले गए जयपुर पादराने पर ठाकुर श्री गोपीनाथ जी विक्रम संवत 1866 में बोहरा राजा खुस्याली राम की हवेली में विराजमान हुए इस प्रकार से देखा गया कि वर्धमान के राजा त्रिलोकचंद जी द्वारा बनवाया गया मंदिर भी 28 वर्षों के पश्चात छोड़ना पड़ा

उधर जयपुर का इतिहास आरंभ हुआ ठाकुर श्री गोपीनाथ जी जयपुर जाकर पिता राजा पृथ्वी सिंह की यादगार में पुत्र राजा मधौ सिंह द्वारा बनवाई गई माधव विलास हवेली में विराजमान हुए यहां ठाकुर 17 वर्ष तक विराजमान रहे पुन:सन 1792 ईस्वी में तात्कालिक दीवान राजा खुशीराम बोहरा जो की परम भक्त न:संतान थे अपनी निजी हवेली पुरानी बस्ती में स्थित गोपीनाथ जी को विराजमान कर दिया यहां बड़े धूमधाम से पटोत्सव मनाया खंडेले राजा वृंदावन दास ने बोहरा की जयरामपुरा नामक ग्राम उदक में प्रदान किया था जिसे सन 1812 ईस्वी में अपने मरने के पहले ही श्री गोपीनाथ जी की सेवा में अर्पित कर गए अब भी कामा मंदिर के सेवा अधिकारी जयपुर के ही गोस्वामी गण हैं कामा तथा जयपुर के अतिरिक्त श्री गोपीनाथ जी के सात मंदिर राजस्थान में और भी हैं औरंगजेब के आतंक से श्री गोपीनाथ जी राजस्थान में जाकर यहां वहां ठहरे। उनकी संपत्ति राजस्थान में अभी चार जिलों में फैली हुई है अर्थात जयपुर सीकर भरतपुर एवं झुंझुनू

यहां वृंदावन में मंदिर के दो भाग हो गए प्राचीन खंडित मंदिर के भाग में महाप्रभु श्री चैतन्य देव विराज रहे हैं दूसरे प्रवेश द्वार का हिस्सा पूर्व द्वारी है जहां श्री नंदकुमार बसु ने नया मंदिर बनवाकर श्री गोपीनाथ जी का प्रतिरूप विग्रह प्रतिस्थापित कराया।

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